हरियाणा के कैथल जिले का 24 वर्षीय युवक कर्मचन्द अब इस दुनिया में नहीं है। उसका शरीर रूस के झंडे में लिपटा हुआ उसके गाँव लौटा, और पूरा इलाका शोक में डूब गया। कहा जा रहा है कि उसे रूस की सेना में भर्ती के नाम पर विदेश भेजा गया था, जहाँ उसे धोखे से यूक्रेन युद्ध में झोंक दिया गया। उसके परिवार को यह विश्वास भी नहीं था कि एक साधारण नौकरी के सपने देखने वाला उनका बेटा किसी विदेशी युद्ध में जान गंवा बैठेगा। यह घटना केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि हर उस भारतीय परिवार के लिए एक चेतावनी है जो बेहतर भविष्य की तलाश में अपने बच्चों को विदेश भेजने का सपना देखता है।
कर्मचन्द का सपना था कि वह विदेश जाकर परिवार की आर्थिक स्थिति सुधार सके। गांव में खेती से जो कुछ भी आता था, उससे घर का गुजारा मुश्किल से चलता था। कुछ एजेंटों ने उसे आश्वासन दिया कि रूस में एक सरकारी अनुबंध के तहत उसे सैन्य सेवा में भर्ती कराया जाएगा, जहाँ वेतन अच्छा मिलेगा और स्थायी वीज़ा का रास्ता भी खुलेगा। इन आकर्षक झूठों के जाल में फँसकर वह अपने सपनों को सच मान बैठा। पर हकीकत में यह एक सुनियोजित धोखा था, जो कई बेरोजगार युवाओं को फँसाने के लिए रचा गया था।
कर्मचन्द का परिवार जब तक सच्चाई समझ पाता, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। रूस से एक कॉल आई — जिसमें बताया गया कि वह यूक्रेन के मोर्चे पर लड़ाई में मारा गया है। परिवार ने पहले इसे अफवाह समझा, लेकिन कुछ दिनों बाद उसका शव रूस के झंडे में लिपटा आया। गांव में मातम छा गया। माँ-बाप की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे, और गांव के लोग अब भी यह सवाल पूछ रहे हैं — आखिर भारत का एक युवा रूस और यूक्रेन के युद्ध में कैसे पहुंच गया?
स्थानीय लोगों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण के पीछे कुछ ट्रैवल एजेंट और विदेशी रिक्रूटमेंट नेटवर्क काम कर रहे हैं जो बेरोजगार युवाओं को “विदेश में नौकरी” के नाम पर झूठे वादे करते हैं। ये लोग उन्हें विज़ा और जॉब लेटर दिखाकर रूस या अन्य देशों में भेज देते हैं। लेकिन वहाँ पहुंचने के बाद असली कहानी शुरू होती है — युवाओं से कहा जाता है कि उन्हें एक सैन्य अनुबंध पूरा करना होगा। बहुत से लोग डर के मारे विरोध नहीं करते, क्योंकि पासपोर्ट उनसे छीन लिया जाता है।
भारत सरकार ने पहले भी ऐसे कई मामलों पर चेतावनी दी थी। लेकिन छोटे शहरों और गांवों में एजेंट अभी भी सक्रिय हैं। वो युवाओं को बताते हैं कि “विदेश में काम मिलेगा, डॉलर में सैलरी होगी, और दो साल बाद नागरिकता भी।” पर सच्चाई यह है कि ऐसे कई भारतीय, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका के नागरिक रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष में अनजाने सैनिक बन गए हैं।
कर्मचन्द के गांव में जब उसकी अर्थी उठी, तो पूरे इलाके में यह चर्चा थी कि कोई भी युवा अब ऐसे लालच में न पड़े। उसके पिता ने कहा — “अगर हमें पता होता कि हमारा बेटा लड़ाई में जा रहा है, तो हम उसे कभी नहीं भेजते। हमें बताया गया था कि उसे ‘सेफ ज़ोन’ में ड्यूटी मिलेगी।” परिवार के अनुसार, एजेंट ने उनसे लगभग ₹3.5 लाख रुपये लिए थे, जो उन्होंने कर्ज लेकर दिए। अब बेटे की लाश वापस आई है और पैसे भी डूब गए हैं।
यह घटना उस समय और भी संवेदनशील हो जाती है जब हम यह देखते हैं कि हरियाणा जैसे राज्य में बेरोजगारी दर पहले से ही राष्ट्रीय औसत से अधिक है। युवाओं में विदेश जाने की ललक बढ़ रही है। हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कई जिलों में युवाओं का सपना “विदेश में काम करना” ही बन गया है। एजेंट इसका फायदा उठाते हैं और सोशल मीडिया पर आकर्षक विज्ञापन डालते हैं — “रूस में सरकारी नौकरी”, “विदेश में सैलरी ₹2 लाख महीने”, “सैन्य अनुबंध के तहत नौकरी सुरक्षित” — ऐसे जालों में कई युवा फँस चुके हैं।
कर्मचन्द की कहानी केवल एक दर्दनाक घटना नहीं, बल्कि एक सामाजिक सबक भी है। हमें यह समझना होगा कि किसी भी विदेशी अवसर को जांचे-परखे बिना स्वीकार करना आत्मघाती हो सकता है। परिवारों को भी यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि वे अपने बच्चों को एजेंटों के चंगुल से बचाएं। बेरोजगारी की समस्या का समाधान देश के भीतर ही खोजा जाना चाहिए — ताकि कोई भी युवा अपने जीवन को जोखिम में डालकर विदेश में “अज्ञात युद्ध” में न मरे।
इस घटना से सरकार पर भी कई प्रश्न उठे हैं — क्या भारत में ऐसे नेटवर्क पर निगरानी है? क्या विदेश मंत्रालय के पास ऐसे युवाओं की सूची है जिन्हें भर्ती के नाम पर भेजा गया? क्या ऐसे एजेंटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी? ये प्रश्न अब हरियाणा से लेकर दिल्ली तक गूंज रहे हैं।
गांव में कर्मचन्द के दोस्त बताते हैं कि वह बहुत मेहनती था। उसका सपना था कि घर के लिए नया मकान बनाए, बहन की शादी अच्छे से करे और माता-पिता का कर्ज चुकाए। लेकिन उसे नहीं पता था कि उसके सपनों की कीमत उसकी जान होगी। अब उसके दोस्त और रिश्तेदार उसकी याद में एक फाउंडेशन बनाने की योजना बना रहे हैं, जो युवाओं को “विदेश भर्ती ठगी” से बचाने के लिए जागरूकता अभियान चलाएगा।
इस घटना का असर केवल भावनात्मक नहीं है, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी गहरा है। विदेश में काम की तलाश में हर साल हजारों भारतीय युवा बाहर जाते हैं। इनमें से कई को गलत दस्तावेज़ों और झूठे वादों के जरिए खतरनाक इलाकों में भेजा जाता है। कुछ लोग युद्धग्रस्त क्षेत्रों में पहुँच जाते हैं, जहाँ उनकी जान खतरे में होती है। कई बार ये एजेंट सोशल मीडिया, व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर विदेशी भर्ती के नाम पर युवाओं को फँसाते हैं।
अब समय आ गया है कि भारत सरकार, राज्य सरकारें और स्थानीय प्रशासन मिलकर ऐसे नेटवर्क पर पूरी तरह से शिकंजा कसें। अगर यह नहीं हुआ, तो कर्मचन्द जैसे और भी कई युवाओं की ज़िंदगियाँ यूं ही मिट जाएँगी। हरियाणा के युवाओं में जोश है, ताकत है, लेकिन इस जोश को सही दिशा देना समाज की ज़िम्मेदारी है।
कर्मचन्द की मौत हमें यह याद दिलाती है कि देश की सीमाओं से बाहर के युद्ध हमारे नहीं हैं, लेकिन उनके जाल में फँसना हमारे युवाओं की मासूमियत की सबसे बड़ी त्रासदी है। आज ज़रूरत है जागरूकता, सतर्कता और ठोस नीति की — ताकि किसी और भारतीय का शव किसी और देश के झंडे में लिपटकर अपने घर न लौटे।
यह खबर केवल एक मौत की रिपोर्ट नहीं, बल्कि एक चेतावनी है उस समाज के लिए जहाँ बेरोजगारी और झूठे सपनों के बीच युवाओं का भविष्य फँसता जा रहा है। कर्मचन्द के पिता की आँखों में जो दर्द है, वह पूरे देश के माता-पिता के लिए एक सन्देश है — “विदेश का सपना अच्छा है, पर ज़िन्दगी उससे बेहतर है।”
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